अल्लाह को प्यारी है कुर्बानी-हुजूर नसीरे मिल्लत

बकरों की कुर्बानी और तबर्रुख तकसीम का काम पर्दे में करें

दुद्धी, सोनभद्र। कुर्बानी इस्लाम का रूह है। यह एक जिंदा हकीकत है। इंसान तो मर जाता है लेकिन उसकी कुर्बानी नहीं मरती। जानवरों के साथ साथ किसी इंसान की नेक ख्वाहिशों और उसकी जरूरत के लिए अपनी चाहतों को कुर्बानी देना भी अल्लाह को बेहद प्यारी है। हजरत इब्राहिम व इस्माईल दुनियां से तशरीफ ले गए मगर उनकी कुर्बानी आज भी बाकी है, और कयामत तक बाकी रहेगी। यही अल्लाह का फरमान और उसके प्यारे रसूल की सुन्नत है। अल्लाह हमें कुर्बानी की रूह को समझने की तौफीक दे। दारुल उलूम कादरिया ग्रुप के संस्थापक हुजूर नसीरे मिल्लत ने ईदुल-अज़हा के त्योहार के मद्देनजर अखबारनवीसों से विशेष बातचीत में कही। उन्होंने कहा कि जिलहिज्जा की 10, 11 व 12 तारीख को ईद-उल-अजहा का त्योहार मनाया जाता है। इस मौके पर जानवरों की कुर्बानी की जाती है, इसलिए अक्सर लोग इसे बकरा ईद भी कहते हैं। यह ईद दो नबियों के यादगार है की यादगार है। हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के हुक्म से अपने चहेते बेटे हजरत ईस्माइल अली अलैहिस्सलाम को उनकी राह में पेश कर दिया था। उसी याद को ताजा रखने के लिए अल्लाह ने हमें भी कुर्बानी करने का हुक्म दिया है। वही कुर्बानी आज हमारे लिए यादगार बना दी गई।हम ईदुल-अजहा के मौके पर अल्लाह की राह में जानवर जबह करके उस याद को ताजा करते हैं। जानवर कुर्बानी करना तो एक अलामत है। हकीकत तो यह है कि अपने इस अमल से हमारे अंदर फरमाबरदारी, जानिसारी, ईमानदारी और सच्चाई का जज्बा पैदा होता है। इंसान मुत्तक़ी व परहेजगार बन जाता है। अल्लाह को तो यही पसंद है। ईद-उल-अजहा का पैगाम यह है कि हम अपने आप को अल्लाह या रसूल के फरमान पर अमल करने के लिए तैयार रहें। उसकी रज़ा पर हम अपनी पसंद व ख्वाहिशों को कुर्बानी कर दें। हर तरह की नाफरमानी से बचें। जानवरों की कुर्बानी के साथ-साथ अपनी कुर्बानी का जज्बा भी बेदार करें। अल्लाह के फरमान और रसूलल्लाह की सुन्नतों पर अमल करने में ही हमारी निजात व भलाई है।
हजरत ने ईदुल अज़हा पर की जाने वाली कुर्बानी और उसके गोश्त को बतौर तबर्रुख पर्दे में करने की हिदायत दी। उन्होंने पूरे एहतराम और इस्लामी तौर तरीके से कुर्बानी का पर्व मनाने की अपील की।



