चिट्ठी न कोई संदेश, जाने वो कौन सा देश, जहां तुम चले गए…….
क्रिकेट के कुंभ की नींव रखने वाले गोपाल दास के निधन से हर किसी की आंखें नम

दुद्धी, सोनभद्र (मु.शमीम अंसारी)
आंखों से दूर सही दिल से कहाँ जाओगे,
जाने वाले हमें तुम याद बहुत आओगे।
80 के दशक में दुद्धी जैसे छोटे से कस्बे में चंद सहयोगियों के साथ अंतरराज्जीय क्रिकेट की संगे बुनियाद रखने वाला सादगी पसन्द सख्श 73 वर्षीय गोपाल दास जायसवाल 38वें साल के टूर्नामेंट को अलविदा कह गया। उनके अचानक चले जाने से टूर्नामेंट की आयोजन समिति, खिलाड़ियों और खेल प्रेमियों को भारी सदमा लगा है।
1987 में की थी टूर्नामेंट की शुरूआत

हम तो चले थे अकेले ही जानिबे मंजिल मगर,
लोग मिलते गए और कारवां बनता गया।
1987 में अधिवक्ता बजरंग लाल उपाध्याय, समरजीत सिंह बी साहब, अच्छू खान, सलीम खान, सुनील जायसवाल, महेंद्र एड, अनिल जायसवाल जैसे सहयोगियों और खिलाड़ियों के साथ प्रथम अंतरराज्जीय क्रिकेट टूर्नामेंट की शुरुआत की। टीन के गोल डब्बे पर दान पात्र लिखकर समूचे नगर में घूम-घूम कर क्रिकेट टूर्नामेंट का चंदा इकट्ठा करने के परंपरा की शुरुआत की। तत्कालीन पीएचसी के प्रभारी डॉ पीएन सिंह ने श्री जायसवाल और खिलाड़ियों की लगन को देखा तो हिंडाल्को से एकमुश्त कुछ सहयोग राशि दिलाया जिससे कमेटी को बहुत राहत मिली।
चंद वर्षों के प्रयास ने दिला दी टूर्नामेंट को लोकप्रियता

(पूर्व डीएम व प्रमुख सचिव पनधारी यादव को सम्मानित करते संस्थापक गोपाल दास जायसवाल)
धीरे-धीरे कारवां बढ़ता गया। ईनामी धनराशि बढ़ने के साथ टूर्नामेंट जब मीडिया की सुर्खियां बनी तो जनपद से मंडल, मंडल से उत्तर प्रदेश, प्रदेश से बिहार, मप्र, झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, दिल्ली तक की टीमों के आने की होड़ लग गई। क्रिकेट की लोकप्रियता व दायरे में बेहद इजाफा हुआ।
ये-ये शिरकत कर चुकी हैं क्रिकेट की मायनाज़ हस्तियां

हुए थे कुछ जमा आंसू मेरी आँखों से बह-बह कर
समंदर नाम इसका रख दिया यारों ने कह-कह कर।।
भारतीय टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी, कामरान, मृत्युंजय त्रिपाठी, संजीव मिश्रा, धर्मेंद्र मिश्रा, आंनद भगत, विक्रम राठौर, सनद चटर्जी, अबरार अहमद, दीपक, भारतीय महिला टीम की वर्तमान सदस्य स्नेह राणा सहित कई दर्जन रणजी खिलाड़ी, वीजी ट्राफी, हेमंत ट्राफी, आईपीएल सहित राष्ट्रीय स्तर के क्रिकेट की उच्चस्तरीय प्रतिस्पर्धाओं में प्रतिभाग कर चुके खिलाड़ियों का आगमन हुआ, जो आज भी अनवरत जारी है।
अस्वस्थता के बावजूद टूर्नामेंट पर नहीं आने दी आंच

2004 में गोपाल दास जायसवाल तबियत अस्वस्थ होने के कारण टूर्नामेंट न करा पाने की बात कही तो टूर्नामेंट आयोजन के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा। खिलाड़ियों की तमाम आरजुओं और तमन्नाओं का मरकज बने गोपाल दास की इस बात से सहयोगियों को सदमा लगा वही उनकी यह भी दिली तमन्ना थी कि टूर्नामेंट किसी हाल में बंद न हो। बाद में संतोष जायसवाल, रामपाल जौहरी मु.शमीम अंसारी, महबूब खान, सलीम खान, रविन्द्र जायसवाल, जबीं खान, सुमित सोनी टूर्नामेंट के कारवां को आगे बढ़ाते रहे। टूर्नामेंट की बुलंदियों को देख हमेशा गोपाल दास जायसवाल नेतृत्वकर्ताओं का मनोबल बढ़ाते रहे।
इन अधिकारियों को खिंच लाई थी टूर्नामेंट की चाहत

हर टूर्नामेंट के उद्घाटन एवं समापन समारोह में अपनी उपस्थिति अनिवार्य रूप से दर्ज कराते हुए अतिथियों में सांसद रामशकल, पकौड़ी लाल कोल, भाई लाल कोल, जिला पंचायत अध्यक्ष अमरेश पटेल, आईजी कश्मीरा सिंह, जिलाधिकारीगण में पनधारी यादव, दुर्गा शंकर मिश्र, दिनेश कुमार सिंह, विजय विश्वास पंत, टीके सीबू, जनपद के पुलिस अधीक्षक में मोहित अग्रवाल, डॉ प्रीतिंदर सिंह, शिवशंकर सिंह, डॉ केएस प्रताप कुमार, रघुवीर लाल, दावा शेरपा, पूर्व मंत्री विजय सिंह गोंड, विधायकगण में सीएम प्रसाद, रूबी प्रसाद, अविनाश कुशवाहा, सुनील यादव, रमेश चंद दुबे, हरिराम चेरो, रामदुलारे गोंड आदि जनप्रतिनिधियों को सम्मानित करना और उनसे सम्मान पाना उनके कर्तव्यों में शुमार व उनके जिंदगी के हसीन पलों में से था।
ये दुद्धी में जो क्रिकेट की बहार छाई हुई है,
ये पौध भाई गोपाल दास की लगाई हुई है।।



