सोनभद्र

सोनभद्र और रामानुजगंज की चट्टानों में अद्भुत समानता, ढाई अरब वर्ष पुरानी धरती की कहानी उजागर

विकास अग्रहरि
म्योरपुर/सोनभद्र
छत्तीसगढ़ के रामानुजगंज और उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद के आदिवासी क्षेत्रों में न केवल सांस्कृतिक परंपराओं की समानता देखने को मिलती है, बल्कि भूवैज्ञानिक दृष्टि से भी दोनों क्षेत्रों की प्राकृतिक संरचना एक जैसी पाई गई है। इस तथ्य का खुलासा लखनऊ विश्वविद्यालय के शोध छात्रों द्वारा किए गए अध्ययन में हुआ है।
लखनऊ विश्वविद्यालय की शोध टीम ने सोनभद्र जनपद के म्योरपुर विकासखंड अंतर्गत रनटोला क्षेत्र स्थित जामतिहवा नाला, मुर्धवा नाला और खांडपत्थर नाले का गहन अध्ययन किया। इससे पहले टीम ने छत्तीसगढ़ के रामानुजगंज क्षेत्र की नदियों और पहाड़ियों का सर्वे कर चट्टानों के नमूने एकत्र किए थे।
शोध छात्रा फिरदौस और गरिमा मिश्रा ने बताया कि दोनों क्षेत्रों से लिए गए नमूनों में चट्टानों की बनावट और संरचना में आश्चर्यजनक समानता पाई गई है। ये चट्टानें लो-टू-मीडियम ग्रेड रूपांतरित (लो टू मीडियम सीआईटी जेट) चट्टानों से निर्मित हैं। एकत्रित नमूनों की प्रयोगशाला में विस्तृत जांच की जाएगी।
लखनऊ विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. विभूति राय के अनुसार, सोनभद्र के चोपन क्षेत्र अंतर्गत झिरगाडंडी की चट्टानें सोन वैली क्षेत्र की सबसे प्राचीन चट्टानों में शामिल हैं, जिनकी आयु लगभग ढाई अरब वर्ष मानी जाती है। उन्होंने बताया कि इससे अधिक पुरानी चट्टानें इस क्षेत्र में नहीं पाई जातीं और इनका साम्य सिंहभूमि तथा अरावली क्षेत्र की चट्टानों से भी देखा जाता है।
प्रो. राय का कहना है कि भले ही रामानुजगंज और सोनभद्र दो अलग-अलग राज्यों में स्थित हों, लेकिन भूवैज्ञानिक दृष्टि से दोनों ही क्षेत्र एक ही प्राचीन भूखंड की कहानी कहते हैं। भूविज्ञानियों के अनुसार इन क्षेत्रों में पाई जाने वाली चट्टानें पृथ्वी के प्रारंभिक विकास काल, यानी आर्कियन और प्रारंभिक प्रोटेरोज़ोइक युग में बनी थीं, जब धरती की सतह स्थिर होना शुरू हुई थी।
रामानुजगंज क्षेत्र छोटानागपुर पठार और उससे जुड़े प्राचीन क्रेटन भू-खंड का हिस्सा है, जहां ग्रेनाइट, गनीस और अन्य क्रिस्टलाइन चट्टानें प्रमुख रूप से पाई जाती हैं। इसी प्रकार सोनभद्र के झिरगाडंडी क्षेत्र में भी क्वार्टजाइट, गनीसिक संरचनाएं और लो-टू-मीडियम ग्रेड रूपांतरित चट्टानें देखी जाती हैं।
ढाई अरब वर्ष पुराने इस भूगर्भीय ढांचे पर समय-समय पर धरती की हलचल, मोड़ और दरारें बनीं, लेकिन मूल चट्टानी आधार आज भी सुरक्षित है। यही कारण है कि रामानुजगंज और सोनभद्र की चट्टानों में संरचनात्मक और खनिजीय समानता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यह खोज वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ-साथ खनिज, पर्यावरण और भूमि उपयोग की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

चट्टानों की आयु और खनिजों का रहस्य
प्रो. डॉ. विभूति राय के अनुसार लोरिक क्षेत्र की चट्टानें लगभग डेढ़ अरब वर्ष पुरानी हैं, जबकि इनके नीचे पाए जाने वाले फॉसिल्स की आयु लगभग 1 अरब 60 करोड़ वर्ष आंकी गई है। वहीं मुर्धवा और जामतिहवा नाला क्षेत्र की चट्टानें लगभग 180 करोड़ वर्ष पुरानी मानी जाती हैं।
उन्होंने बताया कि इस कालखंड की चट्टानों में खनिज प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने लगते हैं। परसोंई क्षेत्र में कायांतरित चट्टानें पाई जाती हैं, जिनमें खनिज सतह पर उभरकर नजर आते हैं। यहां मिनी रत्न जैसे आकर्षक पत्थरों की मौजूदगी भी देखी गई है, जो इस क्षेत्र की भूवैज्ञानिक महत्ता को और बढ़ाती है।

Vikash Agrahari

विकास अग्रहरी सोनभद्र म्योरपुर निवासी है। कम समय मे विकास अग्रहरी आज जिले की पत्रकारिता मे एक जाना पहचाना नाम है।

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