सोनभद्र

वनाधिकार के अनुपालन के लिए डीएम से मिला आइपीएफ का प्रतिनिधिमण्डल

डीएम ने वनाधिकार प्रक्रिया में तेजी लाने का दिया आश्वासन
सोनभद्र। आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के प्रतिनिधि मंडल ने हाईकोर्ट के आदेश के बाद वनाधिकार कानून को लागू करने की शुरू की गई प्रक्रिया के ठप होने और मुख्यमंत्री द्वारा 15 नवंबर को वितरण किए गए स्वीकृत पत्रों में जमीन आवंटन न होने का सवाल जिलाधिकारी सोनभद्र से मुलाकात के दौरान उठाया। जिलाधिकारी द्वारा बताया गया कि कतिपय वजहों से वनाधिकार दावों के पुनः परीक्षण की प्रक्रिया इधर धीमी रही है, उन्होंने आश्वस्त किया कि स्वीकृत पत्रों में जमीन आवंटन का कार्य जल्द शुरू होगा। इसके अलावा शेष बचे दावों के निस्तारण के लिए भी प्रक्रिया शुरू की जाएगी। प्रतिनिधि मंडल में आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के प्रदेश महासचिव दिनकर कपूर व युवा मंच के प्रदेश संयोजक राजेश सचान शामिल रहे।
आइपीएफ द्वारा डीएम को सौंपे गए ज्ञापन में बताया गया कि 15 नवम्बर 2022 को बभनी में मुख्यमंत्री योगी जी द्वारा लगभग 4 हजार आदिवासियों को स्वीकृत पत्रों का वितरण किया गया है और यह भी घोषणा की गई थी कि शेष बचे आदिवासियों के दावों का निस्तारण कर उन्हें पट्टा वितरित किया जाएगा। लेकिन 6 महीने बाद भी स्वीकृत पत्रों में भी भौमिक अधिकार नहीं दिया गया।
डीएम को अवगत कराया गया कि आदिवासी वनवासी महासभा द्वारा 2017 में माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद में अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 के तहत दाखिल किए दावों पर अधिकार के लिए जनहित याचिका संख्या 56003/2017 दाखिल की गई थी। इस जनहित याचिका में माननीय उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने 11 अक्टूबर 2018 को दाखिल दावों पर पुनर्विचार करने और अधिकार देने के संबंध में उत्तर प्रदेश शासन को निर्देश दिया था। इसके बाद प्रदेश में वन अधिकार कानून के तहत जमा दावों के पुनः परीक्षण की प्रक्रिया शुरू हुई। परंतु बड़ा खेद का विषय है कि हाईकोर्ट के आदेश के लगभग 5 साल की समयावधि बीतने के बाद भी अभी तक किसी भी आदिवासी को वनाधिकार कानून के तहत भौमिक अधिकार नहीं मिला, उल्टे आदिवासियों का वन विभाग द्वारा उत्पीड़न किया जा रहा है। घोरावल के परसौना, उभ्भा व पेढ़ जैसे तमाम गांवों में वन अधिकार कानून के तहत दावा करने वाले आदिवासियों और वनाश्रितों पर वन विभाग ने फर्जी मुकदमे कायम कर दिए गए हैं जबकि वनाधिकार कानून में स्पष्ट उल्लेख है कि जब तक दावों का निस्तारण न हो जाएं तब तक किसी भी दावेदार को वन भूमि से बेदखल न किया जाए। हाईकोर्ट द्वारा भी दावों के निस्तारण होने तक किसी तरह की उत्पीड़न की कार्रवाई न करने का आदेश दिया गया था।

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