सोनभद्र की पहाड़ियों में बिखरे मिनी रत्न, अवैध दोहन से खतरे में प्राकृतिक धरोहर

जुगैल आदिवासी क्षेत्र में स्फटिक–जैस्पर की मौजूदगी, संरक्षण से हजारों युवाओं को मिल सकता है रोजगार
म्योरपुर/सोनभद्र (विकास अग्रहरि)
जिले के ओबरा तहसील क्षेत्र के जुगैल–परसोई और सिंदुरिया क्षेत्र में -कीमती मिनी रत्नों और विशेष खनिजों की मौजूदगी ने एक बार फिर इस अंचल की भू-वैज्ञानिक महत्ता को रेखांकित किया है। स्फटिक (क्वार्ट्ज), जैस्पर, अगेट जैसे खनिज यहां की प्राचीन चट्टानों में प्राकृतिक रूप से पाए जाते हैं। और पहाड़ियों से लेकर किसानों के खेत में बिखरे पड़े है। भू-विशेषज्ञ और लखनऊ विश्व विद्यालय के प्रो विभूति राय के अनुसार ये खनिज न सिर्फ आभूषण और सजावटी उपयोग के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि इनके वैज्ञानिक और औद्योगिक उपयोग भी हैं। ऐसे में इनका संरक्षण और नियंत्रित उपयोग समय की मांग बन गया है। क्षेत्र के जीत लाल,सोबरन, धर्मेंद्र, उमेश चौबे, आदि ने कहा है कि मिनी रत्नों को सरंक्षण बहुत जरूरी है स्थानीय स्तर पर जानकारी के अभाव और अवैध संग्रहण के कारण इन मिनी रत्नों को नुकसान पहुंचने की आशंका बनी रहती है। कई बार लोग इन्हें सामान्य पत्थर समझकर या बिना वैज्ञानिक सलाह के निकाल लेते हैं, जिससे प्राकृतिक संरचना और पर्यावरण दोनों प्रभावित होते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बिना योजना के दोहन हुआ तो आने वाली पीढ़ियों के लिए यह धरोहर समाप्त हो सकती है। उपरोक्त लोगों का कहना है कि जुगैल आदिवासी क्षेत्र है यहां के हजारों युवा रोजगार के लिए पलायन करते है ऐसे में मिनी रत्नों का सरंक्षण कर इसको उद्योग से जोड़ा जाए और बाहरी हस्तक्षेप से दूर रखा जाए। तो हजारों युवकों को रोजगार भी मिल सकता है उसके लिए उचित प्रशिक्षण की जरूरत सरकार पूरा करे और व्यवसायिक रूप से तो सरकार के खजाने में भी वृद्धि होगी
संरक्षण को लेकर भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण, सीमांकन और जागरूकता अभियान जरूरी हैं। वन विभाग, खनन विभाग और जिला प्रशासन के समन्वय से इन क्षेत्रों को “भू-विरासत स्थल” के रूप में विकसित किया जा सकता है। इससे एक ओर जहां अवैध दोहन रुकेगा, वहीं दूसरी ओर शोध, शिक्षा और नियंत्रित पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का मानना है कि सोनभद्र पहले से ही खनन और औद्योगिक दबाव झेल रहा है। ऐसे में मिनी रत्नों का संरक्षण सतत विकास की दिशा में एक सकारात्मक कदम होगा। प्रो विभूति का कहना है कि सही नीति, स्थानीय सहभागिता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह क्षेत्र न सिर्फ अपनी प्राकृतिक संपदा बचा सकता है, बल्कि रोजगार और पहचान का नया रास्ता भी खोल सकता है।
शोध में मिले मिनी रत्न ज़ुगैल के परोसोई में स्फटिक क्रिस्टल,पारदर्शी पत्थर ज्योति और आभूषण, में उपयोग, लाल जेम्पर,सजावटी वस्तुओं,मूर्तियों और आभूषण में स्तेमाल, आध्यात्मिक दृष्टि से सुरक्षा,ताबीज के रूप में लाभकारी इसके अलावा
लाल जेम्पर,स्फटिक जैसे पत्थरों का माला, कंगन,अंगूठियां, बनाई जाती है।


