भगवान शंकर की महिमा का गायन शारदा भी नहीं कर सकतीं

पिपरी/सोनभद्र (रामकुमार गुप्ता) समन्वय श्री पारदेश्वर पीठम्” में पवित्र श्रावण मास में मास पर्यंत वनखण्डी पारदेश्वर महादेव का पूजन एवं अभिषेक के क्रम में तपोनिधि निरंजनी अखाड़ा के महामण्डलेश्वर, हरिद्वार स्थित विश्वप्रसिद्ध भारत माता मंदिर के ट्रस्टी,समन्वय परिवार ट्रस्ट, जबलपुर (म.प्र.)के ट्रस्टी व अध्यक्ष स्वामी श्री अखिलेश्वरानंद गिरि महाराज का त्रिदिवसीय आगमन “वनखण्डी पारदेश्वरपीठम् “के पवित्र प्रांगण में आयोजित सत्संग में हुआ , प्रतिदिन सायम् 7बजे से ‘शिव महिमा’ पर उनके श्री मुख से पावन प्रवचन से क्षेत्रीय जनमानस आनंदित -उल्लसित हो, सभी ने अपने जीवन के लाभ की महत्त्वपूर्ण बातें श्रवण की।
महामण्डलेश्वर स्वामी श्री अखिलेश्वरानंद गिरि ने अपने शिव महिमा आधारित त्रिदिवसीय प्रवचन माला में उपस्थित श्रद्धालु श्रोता,शिवभक्तों को शिव रहस्य, शिवलिंग के प्राकट्य,शिवोपासना,शिवमहिमा और शिवतत्त्व पर सारगर्भित आख्यान से शिवोपासना/शिव आराधना के लाभ शिवभक्तों को अवगत कराये।
श्री स्वामीजी महाराज ने विभिन्न शिव साहित्य के अनेक प्रेरक प्रसंग सुनाकर शिवभक्तों के सात्त्विक मन का अनुरंजन ही नहीं किया बल्कि शिव शिवलिंग की उत्पत्ति की रोचक कथा,सृष्टि के आदि(आरम्भिक काल में)ब्रह्मा और विष्णु के परस्पर संवाद जिसके परिणाम स्वरूप पृथ्वी लोक पर स्तम्भाकार दिव्य स्थाणु पुरुष के प्रादुर्भाव का प्रसंग उपस्थित श्रोताओं को अत्यंत मनभावन लगा और शिवलिंग पूजन/उपासना व आराधना की प्रेरणा मिली।महामण्डलेश्वर जी ने शिवजी की महिमा के प्रसंग सुनाकर भगवान् शंकर की दयालुता,करुणाउनके विशाल हृदय की कोमलता तथा कैलाश पर्वत पर अन्त्येवासी परिजनों की अनुशासनहीनता पर भगवान् शंकर की कठोरता एवं दण्डित भक्तों की दीनतामयी प्रार्थना पर प्रसन्न हो जाने पर शिव जी की क्षमाशीलता जन्य सहज स्वभाव,उनके ‘आशुतोष गुण’भक्तों के मन में शिवजी के प्रति अनुराग उत्पन्न करने की उत्प्रेरणा मंत्र मुग्ध कर गई।
महामण्डलेश्वर श्री स्वामीजी महाराज ने कैलाशपर्वत पर शंकर जी के सर्वाधिक प्रिय भक्त गंधर्वराज पुष्पदंत द्वारा किये गये अक्षम्य अपराध पर शिवजी के कुपित हो जाने तदुपरान्त पुष्पदंत द्वारा शिवजी को प्रसन्न करने हेतु उसके द्वारा गायन किया गया “शिव महिम्न स्तोत्र”में उनकी महिमा का एक महत्त्वपूर्ण श्लोक सुनाकर स्वामी जी ने उपस्थित श्रद्धालु भक्तों को भाव-विभोर कर दिया–
असितगिरि समं स्यात् कज्जलं सिन्धु पात्रे
सुरतरुवर शाखा लेखनी पत्रमुर्वी।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालम्
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति।।
स्वामीजी ने लोक व्यवहार में विभिन्न प्रकार के शिवलिंग की उपासना /आराधना एवं पूजन के परिणाम पर भी व्याख्यान दिया, पार्थिव (मृत्तिका के हस्तनिर्मित शिवलिंग)पूजन को उन्होने सर्वश्रेष्ठ निरूपित किया। इसी प्रकार स्फटिक मणि के शिवलिंग, पारदमय (पारे का) शिवलिंग तथा नर्मदा नदी के गर्भ से निकाले गये “नार्मद”शिवलिंग की महिमा विस्तार से सुनाया।
अपने तीसरे दिन के प्रवचन श्रृंखला के अंतिम दिन स्वामी जी ने शिवपुराण -उपनिषदों एवं कैलाश पर्वत के उत्तुंग शिखर पर शिव-पार्वती संवाद पर आधारित “शिव गीता” के विविध प्रसंगों का आश्रय लेकर ‘शिवतत्त्व’का दार्शनिक एवं भावनात्मक पक्ष की विशद् मीमांसा की। स्वामीजी के भारतवर्ष के विभिन्न भू-भाग में स्थापित और परम्परागत रूप से प्रतिष्ठित द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन,पूजन,अभिषेक एवं उन सभी के स्मरण की महिमा भी सुनायी। स्वामी जी ने उपस्थित श्रद्धालु,आस्तिक जनों ने कहा- श्रावण का महीना भगवान् शंकर की आराधना का पवित्र मास है,इस मही ने में की गई शिव आराधना,शिवोपासना व्यर्थ नहीं जाती,यह भी बताया कि रुद्राक्ष धारण करना,शिवजी के नाम का पंचाक्षर मंत्र(ओम् नमःशिवाय),माथे पर त्रिपुण्ड लगाना ,इसका भी महत्त्व बताया। भगवान् शंकर के नामोच्चारण का फल भी निरूपित किया और यह भी बताया कि -भगवान् शंकर देवाधिदेव हैं,उन्होंने अपनी पूजा आराधना का अधिकार सभी को समान रूप से बिना किसी विभाजक रेखा के दिया है।स्त्री,वैश्या,सधवा- विधवा स्त्री,यहां तक कि -देवता-दानव-मानव सभी शंकर जी की आराधना करते हैं।यक्ष,गंधर्व,नाग ,किन्नर सभी उनकी पूजा,वंदना उपासना करते हैं। सभी अपने योनि,जीवन की धन्यता का अनुभव करते हैं। अन्त में स्वामी जी ने “महादेव शब्द” नामोच्चारण का महत्त्व और उसका फलितार्थ बताया और उन्होंने कहा-शंकर जी की व्याप्ति बहुत बड़ी है। आकाश में स्थापित सात लोक,पाताल में स्थापित सात लोक पृथ्वी और चौदह भुवनों में शंकर जी की आराधना होती है।



