आधुनिकता की चकाचौंध और पश्चिमी संस्कृति के चलते पुरानी फाग गायकी की परंपरा हो रही विलुप्त

(दुद्धी क्षेत्र में फाग गाते क्षेत्रीय युवकों की टोली (फ़ाइल फोटो))
दुद्धी, सोनभद्र। रंगों का त्यौहार होली आने में अब लगभग पखवाड़े भर का समय बचा है बावजूद इसके कहीं फाग गीत सुनने को नहीं मिल रहे हैं और न ही होली को लेकर पहले जैसी उत्साह देखी जा रही हैं। क्षेत्रों में कुछ गीत बज रहे हैं लेकिन वह साउंड बाक्सों पर ही सुनाई दे रहा है। ढोल मजीरे और झाल की थाप पर गीत नहीं सुनाई दे रहे हैं। ऐसा लग रहा है मानो फाग गीतों की परम्परा लुप्त होने की कगार पर पहुँच रहे हैं।
बता दें कि एक समय था कि फाल्गुन माह आते ही ढोल मजीरों की थाप और फाग गीतों की गूंज लोगों को आह्लादित कर देते थे और महीनें भर होली गीत के साथ हर्ष और उल्लास चलता रहता था। लेकिन अब समय के साथ – साथ स्वस्थ पारंपरिक फाग गीतों की परंपरा भी लुप्त होती जा रही है और लोग मार्डन युग की होली सिर्फ मोबाइल पर सुनने के बेबस देखें जा सकते हैं।फ़ाग गीतों की लुप्त होती परम्परा को लेकर बुजुर्ग काफी चिंतित है कि हमारी संस्कृति की पहचान होली गीत की परम्परा विलुप्त होने की कगार पर है। हालांकि गांवों में कुछ बुजुर्ग कहीं-कहीं इस परंपरा को जीवित करने की कवायद में लगे हुए हैं और ढोलक एवं मजीरा तथा मानर की ताल पर होली गीतों की परम्परा को जीवित रखने में सहयोग दे रहे हैं ।एक – दो दशक पहले फाल्गुन मास आते ही जगह-जगह फाग गीतों व ढोल मजीरों की आवाजें लोगों को घरों से निकलने को विवश कर देती थी। लोग एक साथ बैठकर स्वस्थ पारंपरिक फाग गीतों का आनंद लेते थे। अब गांव में न वह टोली दिखती है न वह स्वस्थ पारंपरिक गीत ।जब गांव में फगुहारो की टोली चलती थी । वह परंपरा अब लुप्त होने के कगार पर है।बुजुर्ग लोग बताते हैं कि कुछ दशक पहले फाल्गुन माह आते ही गांवों में कई स्थानों पर फाग गीत गाने वालों की महफिलें सजने लगती थी। लेकिन वक्त के साथ-साथ सब कुछ बदल गया है ।अब आधुनिकता की चकाचौंध और पश्चिमी संस्कृति के चलते पुरानी फाग गायकी की परंपरा लुप्त होती जा रही है और लोग मोबाइलों एवं डी जे पर ही फ़ाग गीतों का आनन्द ले रहे है । पुरानी परम्पराओं में फगुवा गायन में विशेषकर ताल ,अर्ध तीन ताल , दादरा , कहरवा का आनंद अब दुर्लभ हो गया है ।अगर इसी तरह आधुनिक युग के युवा होली गीतों की परम्परा से दूर भागते गये तो आने वाले समय में होली गीतों की परम्परा को संजोना काफी मुश्किल हो सकता है । लोगों ने कहा कि इस परंपरा को संरक्षित नहीं किया गया तो यह भविष्य में केवल इतिहास बनकर रह जाएगी।



