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निजीकरण वित्तीय पूंजी-भाजपा गठजोड़ का प्रोजेक्ट – वर्कर्स फ्रंट

राष्ट्रव्यापी विरोध में वर्कर्स फ्रंट के कार्यकर्ताओं ने लिया हिस्सा

सोनभद्र। 18 अगस्त को विद्युत कर्मचारी संगठनों द्वारा विद्युत संशोधन विधेयक 2020 और पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण समेत देश के सार्वजनिक उधोगों को बेचने के खिलाफ आयोजित विरोध में वर्कर्स फ्रंट के कार्यकर्ताओं ने आगरा, फिरोजाबाद, अनपरा, ओबरा मऊ आदि जगहों पर कार्यक्रम किए. यह जानकारी पूर्व अधिशासी अभियंता व वर्कर्स फ्रंट के उपाध्यक्ष ई. दुर्गा प्रसाद ने दी.

उन्होंने प्रेस को जारी बयान में कहा कि वित्तीय पूंजी के सक्रिय सहयोग से आरएसएस और भाजपा की सरकार भारतीय अर्थ नीति का पुनर्संयोजन कर रही है और देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों के हितों को पूरा करने के लिए देश की राष्ट्रीय संपत्ति को बेचने में लगी हुई है। इसी दिशा में बिजली, कोयला, रेल, बैंक, बीमा बीएसएनएल, भेल समेत तमाम सार्वजनिक उद्योग जो पिछले 70 सालों में विकसित हुए और जिनके जरिए आम जनमानस को बड़े पैमाने पर राहत पहुंचाई गई उसका निजीकरण किया जा रहा है। यहां तक कि हमारे महत्वपूर्ण खनन स्रोत तेल आदि को भी बेचा जा रहा है। कौन नहीं जानता की पूर्ववर्ती सरकार की ऐसी ही निजीकरण की लूट भरी योजनाओं में हुए भारी भ्रष्टाचार के कारण पैदा जनाक्रोश का लाभ उठाते हुए आरएसएस और भाजपा की सरकार 2014 में सत्ता में आई थी और आज वह इसे और भी जोर शोर से अंजाम दे रही है।

इन्हीं स्थितियों में बिजली क्षेत्र का भी निजीकरण इस सरकार का महत्वपूर्ण एजेंडा बना हुआ है। कारपोरेट की चाकरी की हद यह हो गई कि कर्मचारियों और जनता के आक्रोश का सामना न करना पड़े इसलिए चोर दरवाजे से चुपचाप भारत सरकार के ऊर्जा मंत्री ने लखनऊ का जुलाई माह में दौरा किया और निजीकरण की दिशा में चीजों को बढ़ाने का काम किया। इसे ट्रेड यूनियन नजरिए से महज नौकरशाही की करतूत मानना भारी भ्रम होगा और कर्मचारियों को इससे सावधान रहना होगा।

उन्होंने अपील की कि बिजली के निजीकरण के सवाल को आरएसएस-भाजपा के कारपोरेट हितों को पूरा करने के संपूर्ण प्रोजेक्ट के बतौर देखना और इसके अनुरूप अपने आंदोलन की रणनीति तय करना वक्त की जरूरत है। यह भी अपील की कि सिर्फ फैक्ट्रियों के गेट और कार्यालयों के बाहर सांकेतिक आंदोलन का दौर खत्म हो गया है। इसलिए कर्मचारी आंदोलन को निजीकरण के परिणाम स्वरूप जनता को होने वाले अहित व नुकसान के बारे में बड़े पैमाने पर जन संवाद कायम करना होगा और निजीकरण के सवाल को एक बड़ा राजनीतिक प्रश्न बनाना होगा, इसके लिए राजनीतिक गोलबंदी करनी होगी। कर्मचारी आंदोलन को इन जनविरोधी व राष्ट्र विरोधी नीतियों को लागू करने वाली आरएसएस-भाजपा की सरकार को सत्ता से हटा देने के लिए खुद को और जनता को तैयार करना होगा ताकि निजीकरण के रोड रोलर की दिशा को बदला जा सकें।

मु. शमीम अंसारी कृषि स्नातकोत्तर (प्रसार शिक्षा/जर्नलिज्म) इलाहाबाद विश्वविद्यालय (उ.प्र.)

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