सोनभद्र

बीएचयू के मक्का की प्रजाति लहरा रही आदिवासी क्षेत्रों में

मु.शमीम अंसारी (पूर्व तकनीकी सहायक, कदन्नो योजना भारत सरकार) की कलम से…..

सरकार के किसानों की आय दुगना करने की योजना में हो रही सार्थक

दुद्धी क्षेत्र के प्रमुख फसलों में मक्का व रहर की खेती का नाम है शुमार

दुद्धी, सोनभद्र (मु.शमीम अंसारी/भीम जायसवाल)। सरकार द्वारा किसानों की आय दुगना करने की दिशा में उठाये जा रहे कदम अब अमलीजामा पहनने लगे हैं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय का आधुनिक कृषि पद्धति का सहयोग दुद्धी क्षेत्र के आदिवासी किसानों के लिए वरदान साबित हो रहा है। इसका ज्वलंत नजारा विकास खण्ड दुद्धी के केवाल न्याय पंचायत में देखने को मिल रही है जहां किसानों के खेत में अपनी जवानी की दहलीज पर लहरा रही मक्के की फसल को देखकर लगाया जा सकता है। एक वर्ष पूर्व मात्र 2 दिवसीय प्रशिक्षण ने उनकी पारंपरिक फसल को एक नया आयाम दिया है।

पहाड़ों की नंगी छातियों पर बसने वाले आदिवासी पहाड़, जंगल व उबड़-खाबड़ जमीन को अपनी भुजाओं के बल से समतल कर खेत का स्वरूप दिया। लेकिन सिंचाई, कृषि संयंत्रों व अभियांत्रिकी के अभाव में यहां के किसान विकसित होने की जगह आधुनिक कृषि तकनीकी की होड़ में पिछड़ पिछड़ गए थे। श्रम और पसीने की बूंदों में वह शक्ति है जो अतीत की तस्वीर संवार सकती है। क्षेत्रीय आदिवासी किसानों को एक आलोक की किरण गत वर्ष उस समय नजर आई जब बीएचयू से 60 किसानों को प्रशिक्षण हेतु आमंत्रित किया गया। मास्टर ट्रेनर कृषि औद्योगिक की पशु व पशुपालन गौरी शंकर कुशवाहा के नेतृत्व में गत मार्च अप्रैल को 60 किसानों का एक प्रतिनिधिमंडल काशी हिंदू विश्वविद्यालय जाकर मक्के की फसल पर दो दिवसीय प्रशिक्षण प्राप्त किया। इस दौरान प्रतिभागी किसानों को बीएचयू द्वारा स्प्रे मशीन व मानव चलित सीडड्रिल मशीन मुफ्त में दिया गया था।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ जेपी साही के नेतृत्व में लगभग आधा दर्जन कृषि वैज्ञानिकों की टीम 15 जून से 21 जून के मध्य दुद्धी विकासखंड दुद्धी में आकर 25 पिछड़े व अनुसूचित जनजाति के किसानों को 25 एकड़ में मुफ्त में मक्के की बीज व खाद मुहैया करा पंक्ति-प्रदर्शन कराया गया। कार्यक्रम के तहत मेढ़ को ट्रैक्टर द्वारा रिंज मेकर से बनाकर मानव चलित सीडड्रिल से मेड के ऊपर लाइन टू लाइन 45 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 15 सेंटीमीटर पर पंक्ति में बुवाई की गई। हाइब्रिड मक्का प्रजाति बायोसीड 9544 बीज दर प्रति एकड़ 8 किलो की बुवाई की गई। बुवाई के उपरांत खरपतवार नाशी एट्रेजिन का 500 ग्राम प्रति एकड़ की दर से छिड़काव किया गया। 120 दिन की अवधि वाली यह मक्के की फसल अपना 60 दिन का सफर तय कर जीरा बाली की स्थिति में है। केवाल गांव के अशर्फी, रामप्रसाद, हरे राम, सुशील कुमार यादव, अनिल आदि किसानों की फसल उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। आधी अवधि बीतने के साथ ही फसल अपने शवाब पर है। किसान जरा सी तकनीक में बदलाव के साथ अपनी फसल को देख फुले नही समा रहे है।

प्रगतिशील किसान गौरी शंकर कुशवाहा ने बताया कि दुद्धी क्षेत्र की खेती योग्य कुल भूमि के 40 प्रतिशत हिस्से में मक्का व अरहर की खेती की जाती है। एक तरह से यह दुद्धी क्षेत्र की पारंपरिक फसल बन चुकी है। सिंचाईविहीन इस एरिया में मक्का, अरहर, सावाँ, कोदो, मडुआ, मेझरी व मूंगफली जैसी फसल पर शोध से इस क्षेत्र के किसानों को बहुत लाभ मिलेगा।

Md.shamim Ansari

मु शमीम अंसारी कृषि स्नातकोत्तर (प्रसार शिक्षा/जर्नलिज्म) इलाहाबाद विश्वविद्यालय (उ.प्र.)

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