सोनभद्र

काश्त की भूमि से बालू खनन पर छूट हो-सुरेन्द्र अग्रहरि

दुद्धी, सोनभद्र- जनपद सोनभद्र में कई नदियों के किनारे काश्तकारों की जमीन है लेकिन उस काश्त से बालू उठाने पर वन विभाग के अधिकारियों द्वारा रोक लगाया जाता हैं जिससे लोगो मे आक्रोश है । हीराचक, कोरगी ,डुमरा ,हरपुरा, नगवा,टेढ़ा ,शाहपुर के कई काश्तकारों ने बताया कि हमारी जमीन नदी के किनारे स्थित है ,उस जमीन मेंनदियों में बाढ़ आ जाने के कारण बालू आ जाता हैं उसको उठान करने पर वन विभाग व पुलिस प्रशासन द्वारा रोक लगा दिया जाता है जिससे काश्तकारों को परेशानी होती हैं।ना तो उस जमीन पर से बालू का उठान कर सकते है और ना ही उस पर खेती कर सकते है ।इसलिए ऐसे काश्तकार तो दोनों तरफ से चले जाते है ,यहाँ पर ना खुदा ही मिला ,ना बिसाले सनम वाली उक्ति चरितार्थ होती हैं। और तो और यदि किसी को बालू खनन का लीज मिल जाये तो वह ठेकेदार काश्त की बालू को उठा लेता है और बेच देता है जबकि इस पर उस ठेकेदार को बालू उठान करने का कोई हक नहीं है। इस प्रकार किसान को दोनो तरफ से नुकसान उठाना पड़ता है ।इस पर कोई सरकार ध्यान नहीं देती हैं जबकि इस काश्त से बालू उठान करने का अधिकार उक्त काश्तकार को मिलना चाहिए ।कुछ काश्तकारों ने आज अपनी बात भाजपा नेता डीसीएफ चेयरमैन सुरेन्द्र अग्रहरि से बताई और कहा कि सरकार को काश्त की जमीन से बालू उठान करने का अधिकार मिले और नही तो उसकी क्षतिपूर्ति दी जाए क्योंकि जब सरकार की भूमि पर कोई कब्जा करता है तो सरकारी अमला उस पर कई धाराएं लगाकर उसको जेल भेज देती हैं और डराया धमकाया भी जाता हैं कि उस सरकारी भूमि पर अतिक्रमण नही करोगे लेकिन जब स्वयं की भूमि पर कोई अतिक्रमण करे या उक्त जमीन से कोई ठेकेदार बालू उठाकर खनन करके ले जाये तो उसके लिए क्या प्राविधान है? यदि ज्यादा बाढ़ आ जाये तो वह बालू भी बहकर चला जायेगा तो इसमें किसका फायदा होगा ? एक नदी का बालू एक राज्य से दूसरे राज्य में चला जायेगा ,इसमें फिर ना तो काश्तकारों को फायदा होगा और ना ही सरकार को और ना ही ठेकेदार को ।इसलिए जनहित में यह आवश्यक है कि काश्तकारों को अपनी काश्त की भूमि से बालू खनन करने हेतु अधिकार मिले जिससे उनके गाँव मे या स्वयं के उपयोग में उसका जरूरत के हिसाब से उपयोग किया जा सके।डीसीएफ चेयरमैन सुरेन्द्र अग्रहरि ने उनको आश्वासन दिया कि इस विषय पर जिलाधिकारी महोदय से वार्ता कर उचित हल निकाला जाएगा और यह भी बताया जाएगा कि नदियों के किनारे काश्त की भूमि पर स्थित बालू का उठान या खनन नही होता हैं तो उक्त बालू बाढ़ आने के बाद बह कर दूसरे राज्यों में चली जाती हैं जिसका लाभ न तो किसान को होगा और ना ही सरकार को ।इसलिए इसका लाभ किसानों /काश्तकारों को मिलना चाहिए जिससे काश्तकार कम से कम अपने उपयोग में उसको ले आये या अपने गाँव के लोगो के लिए उपयोगी बन सके।

Md.shamim Ansari

मु शमीम अंसारी कृषि स्नातकोत्तर (प्रसार शिक्षा/जर्नलिज्म) इलाहाबाद विश्वविद्यालय (उ.प्र.)

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