सिंगरौली

उमंग और उत्साह के साथ मनाया गया होली का पर्व

दुद्धी, सोनभद्र (मु.शमीम अंसारी/भीम जायसवाल)। रंगों का त्योहार होली दुद्धी व इर्द-गिर्द के ग्रामीण अंचलों में मस्ती और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को मनाया जाने वाले इस पर्व में नगर सहित गांव-गिरांव में लोग देर दोपहर तक टोलिया बनाकर होली के मस्ती भरे पारंपरिक गीत गाते रहे और एक-दूसरे रंग व गुलाल की बौछार करते रहे।
पौराणिक कथा
होली शब्द भक्त प्रहलाद की बुआ के नाम होलिका से आया है। होलिका दैत्य राजा हिरण्यकश्यप की बड़ी थीं जो भक्त प्रहलाद को मारने के लिए उन्हें गोद में लेकर आग में बैठ गईं थी। कहा जाता है कि नारायण की कृपा से प्रहलाद नहीं जले थे जबकि होलिका जल गईं थीं। इसी के बाद से धुलेंडी और होली मनाने का चलन शुरू हुआ। होली को होरी, होलिका दहन, धुलेंडी, धुरेंडी, धुलण्डी, फगुआ, छोटी होली, रंगवाली होली आदि नामों से जाना जाता है।

दुद्धी क्षेत्र में होली का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। सुबह से जमकर रंग चला। सड़कें लाल, नीले, पीले, हरे व गुलाबी रंगों से पुत गईं। देर रात तक लाउडस्पीकरों पर फिल्मी गीत बजते रहे। युवा व बच्चे इन गीतों पर नाचते-झूमते रहे।बुजुर्गों ने अबीर-गुलाल से अपनों के साथ होली खेली। शाम को घरों में जाकर एक दूसरे के साथ गले मिले और होली की बधाई दी। रंग खेलने में महिलाएं भी पीछे नहीं रहीं। बच्चे पिचकारियों और गुब्बारों में रंग भरकर एक दूसरे पर डालते रहे व होली के जश्न में डूबे रहे।
मंगलवार को सुबह से शहरवासियों के साथ साथ टेढ़ा, दिघुल, निमियाडीह, बघाडू, खजुरी, मलदेवा, रजखड़ ,बीडर, गुलालझारिया, मझौली, दुमहान सहित अन्य ग्रामीणों पर होली का सुरूर चढ़ा रहा।शहरवासी होली के रंगों में रंगे रहे। लोगों ने सुबह से ही रंग-गुलाल उड़ाना शुरू कर दिया। मुहल्लों में युवकों ने एक-दूसरे को लेकर टोली बनाई और चौराहों व प्रमुख मार्गों पर एकत्र हो गए। युवकों ने एक-दूसरे से जमकर रंग खेला।
युवाओं ने सड़कों से गुजरने वाले राहगीरों को भी नहीं बख्शा। वाहन सवारों को रोक-रोककर बुरा न मानो होली है कहकर रंग दिया। शहर के चौराहों व गली नुक्कड़ों में लाउडस्पीकरों पर ‘बलम पिचकारी, जो तूने मुझे मारी’ और ‘होली खेले रघुवीरा, अवध में होली खेले रघुवीरा’ आदि फिल्मी गीत बजते रहे।क्या युवा क्या बच्चे सभी होली के रंग में रंगे नजर आए और गीतों पर खूब जमकर नाचे।

सुबह से बच्चे पिचकारियां लेकर छतों पर डटे रहे और घर के बाहर से गुजरने वाले लोगों पर रंग की बौछार करते रहे। वृद्ध भी होली के रंग में सराबोर रहे और शाम को घर जाकर बधाई देने का दौर शुरु हुआ। एक-दूसरे के घर जाकर अबीर-गुलाल लगाया। गुझिया व नमकीन खाकर होली की बधाई दी। साथ ही लोगों ने पुराने गिले-शिकवे दूरकर एक दूसरे के गले मिले। दो दिनों तक लोग होली के रंग में रंगे रहे।
रंग के साथ-साथ लोगों ने घरों में बने स्वादिष्ट पकवान का भी लुप्त उठाया। रंग खेलने का सिलसिला दोपहर 3 बजे तक चला। रंग खत्म होते ही लोग एक दूसरे के घरों में पहुंचे और होली की बंधाई दी। इस मौके पर घरों पर पहुंचे मेहमानों का तरह-तरह के होली में बनने वाले पकवानों से स्वागत किया गया। देर रात तक यह सिलसिला चलता रहा।

होली के मौके पर गले मिलने का भी चलन है लेकिन इस साल घातक कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते लोगों को सलाह दी गई है कि वे गले न मिलें और सर्दी जुकाम या बुखार से पीड़ित लोगों से दूरी बनाकर रखें। दुद्धी क्षेत्र में भी लोगबाग होली जमकर खेलें लेकिन सेहत का भी ध्यान रखा।

Md.shamim Ansari

मु शमीम अंसारी कृषि स्नातकोत्तर (प्रसार शिक्षा/जर्नलिज्म) इलाहाबाद विश्वविद्यालय (उ.प्र.)

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