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आस्था का महापर्व डाला छठ आज,अस्ताचलगामी भगवान सूर्य को दिया जायेगा सांध्यकालीन अर्ध्यल

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को होने वाला डाला छठ महाव्रत का पौराणिक व धार्मिक सहित सांस्कृतिक,आंचलिक कला उद्योग व संस्कृति को जीवंत रखने का विशेष महत्व है छठ महापर्व वैसे तो वर्ष में दो बार होता है पहला चैत मास में वह दूसरा कार्तिक मास में ।कार्तिक मास के छठ का विशेष महत्व है जिसे डाला छठ के नाम से जानते हैं। नहाए खाए के साथ प्रारंभ होने वाला यह पर्व चार दिवसीय होता है। पहला दिन नहाए खाए,दूसरा दिन खरना खीर भोजन, तीसरा दिन सायंकाल प्रथम अर्ध्य व चौथे दिन प्रातः काल दूसरा अर्ध्य देकर यह पर्व संपूर्ण रूप से संपन्न हो जाता है। नहाए खाए के दिन व्रतियों द्वारा कद्दू की सब्जी( बिना लहसुन प्याज के), चने का दाल व चावल का भोजन किया जाता है। खरना के दिन केवल रात में खीर भोजन किया जाता है।प्रथम अर्ध्य के दिन वर्तीलोग दिनभर निर्जल रहकर पूजन करते हैं। प्रसाद लाल गेहूं के आटे से (स्वयं द्वारा चकरी में पीसकर )उसे शुद्ध घी में बनाया जाता है। पूरे श्रद्धा भाव से सूप में सभी प्रसाद को रखकर वर्तीलोग छठ घाट पर पहुंचकर पूजन प्रक्रिया प्रारंभ करते हैं । इस व्रत को महिलाओं के साथ साथ पुरुषों द्वारा भी किया जाता है। छठ महापर्व में भगवान सूर्य व उनकी दोनों पत्नियां देवी प्रत्युषा(सायं) व देवी उषा (प्रातः) सहित माँ षष्ठी देवी जिन्हें देवी देवसेना, देवी कात्यायनी,देवी प्रकृति या छठी मैया भी कहा जाता है, उनकी पूजा होती है। देवी कात्यायनी इस प्रकृति की अधिष्ठात्री देवी हैं जिन्होंने इस संसार के कल्याण व संतानों की रक्षा के लिए अपने को 6 स्वरूपों में विभक्त किया है उन्ही छह स्वरूपों से छठवां स्वरूप छठी मैया का है।यह परम पिता की यह मानस पुत्री वह भगवान विष्णु की माया है।

त्रेता युग से छठ पूजा का प्रारंभ

कहते हैं कि जब भगवान राम श्री लंका विजय के बाद अयोध्या वापस आए तो उन्होंने कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को संध्याकाल में भगवान अस्ताचलगामी भगवान सूर्य को उनकी पत्नी देवी प्रत्यूषा को अर्ध्य देकर पूजन किया तथा पुनः सप्तमी तिथि में भगवान भास्कर को उनकी पत्नी देवी उषा को उदीयमान अर्ध्य देकर पूजन किया उसी समय से छठ महापर्व का प्रारंभ माना जाता है । भगवान श्री प्रभु श्री राम जी के कुल देवता भी हैं किदम्ब ऋषि की हत्या के पाप से बचने के लिए राजा पांडु वह रानी कुंती द्वारा भगवान सूर्य को अर्ध्य देकर पूजन करने की भी कथा इतिहास में उल्लेखित है। द्वापर काल में देवी द्रौपदी व कर्ण के द्वारा भगवान भास्कर को कार्तिक मास के षष्ठी तिथि के सायं काल व सप्तमी तिथि में प्रातकाल अर्ध्य देकर पूजन करने की कथा प्रचलित है।राजा प्रियंवद व रानी मालिनी की कथा में इन दोनों को कोई संतान नहीं था । महर्षि कश्यप के सुझाव पर राजा और रानी ने पुत्रेष्ठी यज्ञ किया। यज्ञ के प्रभाव से उन्हें पुत्र तो प्राप्त हुआ लेकिन वह मृतक था। इससे दुखी राजा रानी ने अपने प्राणों को त्याग देने का निश्चय किया उसी समय एक शक्तिपुंज प्रकट हुई और बोली राजन मैं परम ब्रह्म की मानस पुत्री व भगवान विष्णु की माया हूँ। संसार मुझे देवसेना प्रकृति देवी या षष्ठी देवी या छठी मैया कहता है। मैं बालकों की रक्षा करने वाली प्रकृति के छठवें अंश से हूं ।तुम मेरी पूजा सविधि करो तथा दूसरों को इसे करने के लिए प्रेरित करो। ऐसा करते हुए देवी ने राजा प्रियमवद व रानी मालिनी के मृतक पुत्र को जीवित कर दिया।तत्पश्चात राजा रानी द्वारा जीवन पर्यंत छठ की पूजा की गई। भगवान सूर्य इस सृष्टि के प्रत्यक्ष अलौकिक देव हैं तथा माता षष्ठी या छठी मैया शक्ति स्वरूपा हैं।

छठ का पौराणिक, सामाजिक व सांस्कृतिक महत्व
छठ महापर्व के महात्म्य व विशेषता पर श्रीरामलीला कमेटी के महामंत्री एवं दुर्गा पूजा समिति मां काली मंदिर के प्रधान पूजा प्रभारी आलोक अग्रहरि ने विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया कि यह पूजा समानता का प्रतीक है इसमें ब्राह्मणों की उपस्थिति ना होने पर भी पूजा संपन्न हो जाती है। अर्ध्य देते समय यदि किसी कारणवस ब्राह्मण देव ना हो तो पति,पुत्र, पुत्री, भांजा ,भांजी कुंवारी कन्या या बुजुर्गों से भीअर्ध्य दिलाने का महत्व है। यह पर्व खासकर मेलजोल का है जो लोग अपने परिवार से दूर रहते हैं इस पर्व पर अपने घर आकर सपरिवार पूजन करते हैं। यह पर्व सामाजिक समरसता समानता का प्रतीक है। इस पर्व में सूप,दउरा बनाने वालों के साथ जंगली व सामान्य फलों को लाने वालों के महत्व को मजबूती प्रदान करता है।
विलुप्त हो रहे हैं फलों व आयुर्वेदिक औषधियों के संरक्षण का है यह महापर्व छठ
यह पर्व प्रकृति में विलुप्त हो रहे उन फलों व वस्तुओं के संरक्षण का भी है । पूजन के लिए प्रयोग में आने वाले जंगली फलों में बेर,वन बेर ,मकोर ,सुधनी, शरीफा ,पपीता, कंदमूल गन्ना, हल्दी ,अदरक, नारियल ,सिंघाड़ा सहित अन्य फलों को संरक्षण करने के लिए प्रेरित करता है ।खासकर यह पर्व नारियों की परम तपस्या का महापर्व है जिसमें स्त्रियां अपने सिंदूर( पति )व आंचल संतान )के दीर्घायु व मंगलमय जीवन के लिए कठिन तपस्या करती हैं। यह महापर्व इसलिए भी महत्वपूर्ण है इसकी की इस पर्व में सिर्फ उगते सूर्य को ही नहीं बल्कि डूबते सूर्य को भी हम पूरी आस्था विश्वास और श्रद्धा के साथ पूजा अर्चन उपासना कर अर्ध्य प्रदान करते हैं।
आस्था का महा केंद्र है दुद्धी का छठ महापर्व
दुद्धी छठ महा पूजा की कमान मुख्यआयोजक श्री जय बजरंग अखाड़ा समिति के हाथों में होती है जो दुद्धी के प्रमुख धार्मिक संगठन श्री रामलीला कमेटी व समस्त दुर्गा पूजा समिति सहित अन्य सामाजिक संगठन व नगर पंचायत के सहयोग से इस महापर्व की तैयारी को पूर्ण करती है । दुद्धी के ऐतिहासिक शिवाजी तालाब पर सैकड़ों वर्षो से छठ पूजा की परंपरा चली आ रही है। घाट को दुल्हन की तरह सजा कर व्रत धारियों की सुख सुविधाओं का विशेष ख्याल रखा जाता है। यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु छठ पूजन करने के लिए आते हैं । ऐतिहासिक शिवाजी तालाब पर हर वर्ष श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि देखी जाती है। मुख्य आयोजन समिति श्रीजय बजरंग अखाड़ा समिति के अध्यक्ष कमलेश सिंह कमल,निवर्तमान अध्यक्ष कन्हैयालाल अग्रहरि ,महामंत्री धीरज जायसवाल ,कोषाध्यक्ष कृपाशंकर अग्रहरि उर्फ गुड्डू, निवर्तमान महामंत्री सुरेंद्र गुप्ता ,निवर्तमान कोषाध्यक्ष दीपक शाह ,संरक्षक गोपाल प्रसाद रिटेलर, अपनी पूरी टीम के साथ छठ महापर्व की तैयारियों में संलग्न दिखे। साथ ही नगर पंचायत अध्यक्ष राजकुमार अग्रहरि अधिशासी अधिकारी भारत सिंह अपनी पूरी टीम के साथ एवं रामलीला कमेटी समस्त दुर्गा पूजा समिति व अन्य सामाजिक संगठन के लोग इस महापर्व की व्यवस्था को सुदृढ़ करने में संलग्न है। पूर्व की भांति इस वर्ष भी श्रद्धालुओं के सुख सुविधाओं का विशेष ख्याल रखा जा रहा है।
इसके साथ छठ महापर्व का आयोजन कैलाश कुंज द्वार लवकुश पार्क,हीरेश्वर मन्दिर लौआ नदी बीडर,ठेमा नदी तट पर भी होता है
लवकुश पार्क में डॉ लवकुश प्रजापति,हीरेश्वर मन्दिर पर रविन्द्र जायसवाल, बालकृष्ण जायसवाल, कमलेश मोहन,ठेमा नदी तट पट संबंधित ग्राम प्रधान अपने सहयोगियों के साथ कार्यक्रम को व्यवस्थित कराने में सक्रिय है।

राम आशीष यादव सोनभद्र के विंडमगज निवासी है।कुछ कर गुजरने की ललक के कारण कम समय मे ही राम आशीष यादव आज जिले की पत्रकारिता मे एक जाना पहचाना नाम है।

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